Sunday, 29 August 2021

अकबर कालीन झारखंड (1556-1605 ई.)



अकबर कालीन झारखण्ड         (1556-1605 ई.)


मुगल बादशाह अकबर ने अपने शासन काल के पूर्वार्द्ध (1556-76 ई.) में झारखंड में सक्रिय मुगल विरोधी अफगानों का दमन किया। अपने शासन काल के उत्तरार्द्ध (1576-1605 ई.) में अकबर ने झारखंड के क्षेत्रीय राजवंशों- नाग वंश (छोटानागपुर खास), चेरो वंश (पलामू व सिंह वंश (सिंहभूम) को मुगलों का अधीनस्थ बनाया। वस्तुतः अकबर के शासन काल तीसवें वर्ष (अर्थात् 1585 ई.) में मुगल साम्राज्य एवं झारखंड के बीच वास्तविक सम्पर्क स्थापित हुआ। यह सम्पर्क 1585 ई. में उस समय स्थापित हुआ जब मुगल फौज ने छोटानागपुर खास के नागवंशी शासक मधुकरण शाह (मधु सिंह) पर आक्रमण किया, उसे हराया तथा उसे मुगल का अधीनस्थ बनाया।


1. अफगानों का दमन :अकबर विरोधी अफगानों में गाजी एवं हाजी बंधु, जुनैद एक बयाजिद प्रमुख थे। इन अफगानियों ने अकबर के विरुद्ध झारखंड क्षेत्र का उपयोग किया टकरोई की लड़ाई (3 मार्च, 1575 ई.) के बाद जुनैद करानी झारखंड के रास्ते बिहार भागने का प्रयास किया। भागने के क्रम में जुनैद ने रामपुर (आज का रामगढ़) नामक पहाड़ी क्षेत्र में शरण लिया। मुगल फौज पीछा करती हुई रामपुर पहुँची। रामपुर की लड़ाई में मुगल फौज ने जुनैद को पराजित किया। इस प्रकार, 1576 ई. तक झारखण्ड क्षेत्र में सक्रिय अकबर के सभी विरोधी अफगान या तो पराजित हो गए या उनकी मृत्यु हो गई।


2. छोटानागपुर खास का नाग वंश: अकबर के शासन काल में सर्वप्रथम मुगलों ने कोकरह खुखरा (नागवंश की तत्कालीन राजधानी) विजय की ओर ध्यान दिया। इसके सामरिक, राजनीतिक व आर्थिक कारण थे। सामरिक कारण- अकबर जानता था कि उसके पिता हुमायूँ के विरुद्ध शेर खाँ ने तथा स्वयं उसके विरुद्ध जुनैद आदि अफगानों ने इस क्षेत्र का बखूबी उपयोग किया था इसलिए इस क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित करना आवश्यक था। राजनीतिक कारण अकबर विस्तारवादी था और वह खुखरा को अपने साम्राज्य के दायरे में लाना चाहता था। आर्थिक कारण–अफगान जुनैद का पीछा करने तथा रामपुर की लड़ाई में उसे पराजित करने के बाद राजधानी लौटी मुगल सेना ने बादशाह अकबर को खुखरा की आर्थिक समृद्धि की जानकारी दी। यह भी कहा जाता है कि कोकरह की शंख नदी में मिलने वाले हीरों ने अकबर का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया। फिर दक्षिण भारत तक पहुँचने में यह नवीन मार्ग बड़े काम का साबित हो सकता था। दूसरी तरफ, अपनी दुनिया में मगन नागवंशी राजा मुगलों की बढ़ती शक्ति की उपेक्षा करते रहे। अबुल फजल के अनुसार खुखरा तक पहुँचने के दुर्गम मार्ग के कारण नागवशी राजा अपने को अति सुरक्षित महसूस करते थे।शाही आदेशानुसार 1585 ई. में शाहबाज खाँ कम्बू ने खुखरा विजय के लिए एक सेना को भेजा। मुगल फौज तेजी से खुखरा की ओर बढ़ी। इलाके में घुसकर मुगल फौज मार काट तथा लूट-पाट मचाने लगी। घबराकर खुखरा के राजा मधुकरण शाह ने मुगल अधीनता स्वीकार कर लिया और सालाना कर देना मंजूर किया। अबुल फजल के शब्दों में खुखरा के राजा ने मालगुजार की स्थिति को स्वीकार कर लिया और इस तरह बादशाही हुकूमत के साये में आने का उसे सौभाग्य प्राप्त हुआ। नागवंशी राजा मधुकरण शाह को बंदी बनाकर मुगल दरबार में ले जाया गया जहाँ उसकी शारीरिक क्षमता एवं विनीत स्वभाव से प्रसन्न होकर बादशाह अकबर ने उसे स्वतंत्र कर खुखरा वापस भेज दिया। खुखरा नरेश मधुकरण शाह ने उड़ीसा के शासक कुतुल खाँ व उसके बेटे निसार खाँ के विरुद्ध मुगल मनसबदार मान सिंह के नेतृत्व में 1590-92 ई. में हुए मुगल अभियान में मुगलों का साथ दिया।


इस तरह, 16वीं सदी ई. के अंत तक खुखरा का एकाकीपन समाप्त हो गया। यह क्षेत्र मुगलों के नियंत्रण में आ गया और उन्हें सालाना कर भी देने लगा। साथ ही, नागवंशी राजा मुगलों का अधीनस्थ सहयोगी बन गया जैसा कि उड़ीसा अभियान के दौरान उसके द्वारा मुगलों को दी गई सहायता से स्पष्ट है।


3 मानभूम (धनबाद) व हजारीबाग क्षेत्र के राजवंश :मानभूम एवं हजारीबाग वाले क्षेत्र भी सर्वप्रथम अकबर के समय में मुगलों के सम्पर्क में आये। 1590-91 ई. में राजा मान सिंह मिदनापुर जाते हुए मानभूम से गुजरा। उसने परा तथा तेलकुप्पी के मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया। से पचेत का किला भी इसी समय निर्मित हुआ। अबुल फजल की आईन-ए-अकबरी के अनुसार हजारीबाग का है तथा चम्पा नामक दो स्थान परगनों के रूप में बिहार सूबा (बिहार प्रांत) में शामिल थे तथा इसकी सालाना मालगुजारी 15,500 रुपये तय की गई थी।


4. पलामू का चेरो वंश: 1589 ई. में राजा मान सिंह बिहार के मुगल सूबेदार बने। पटना को अपने पुत्र जगत सिंह की देख-रेख में छोड़कर मान सिंह पलामू के लिए कूच किया। चेरो ने घरों में उसे रोकने का विफल प्रयास किया। मान सिंह अपनी सेना के साथ आगे बढ़ता ही गया। उसने अनेक चेरो को मार डाला तथा कई चेरो को बंदी बना लिया। पलामू में अपनी स्थिति मजबूत बनाने के बाद वह पटना लौट गया। मान सिंह ने लूट का माल, जिसमें 54 हाथी भी शामिल थे, मुगल दरबार में भेजा। यह माल बादशाह अकबर के पास 3 अप्रैल, 1590 ई. को पहुँचा। भागवत राय (रणपत चोरूह) को पलामू का राजा बना रहने दिया गया और वहाँ एक मुगल फौज रख दी गई। इस तरह चेरो की शक्ति पूर्णरूपेण समाप्त नहीं हुई बल्कि वे कुछ समय के लिए दब गए। वर्ष 1605 ई. में मुगल बादशाह अकबर की मृत्यु से फैली गड़बड़ी का चेरों ने भरपूर फायदा उठाया। उन्होंने मुगल फौज को मार भगाया और अपनी स्वतंत्र सत्ता पुनर्स्थापित कर ली।


5. सिंहभूम का सिंह वंश :खुखरा, मानभूम व हजारीबाग तथा पलामू की भाँति सिंहभूम से भी मुगलों का सम्पर्क अकबर के समय में स्थापित हुआ। वर्ष 1592 के उड़ीसा अभियान के समय राजा मान सिंह सिंहभूम होकर गुजरा। पोरहाट के तत्कालीन सिंहवंशी राजा रणजीत सिंह ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली और वह राजा मान सिंह के अंगरक्षक दल में शामिल हो गया।


1592 ई. में राजा मान सिंह ने राजमहल (साहेबगंज जिला) को बंगाल की राजधानी बनाया। परकोटा और महल वाले नगर का नाम 'अकबर नगर रखा गया। नगर की तीव्र गति