मुगलकालीन झारखंड (1526-1707 ई.)
बाबर ने दिल्ली सल्तनत के अंतिम सुल्तान इब्राहिम लोदी को पानीपत के प्रथम युद्ध (1526 ई.) में हराकर मुगल वंश की स्थापना की। 1540 ई. से 1555 ई. तक यह शासन सूर वंश (शेरशाह व उनके वंशज) के हाथों में चला गया। हुमायूँ ने 1556 ई. में मुगल वंश को पुनर्स्थापित किया। इसके बाद मुगलवंशियों ने 1857 ई. तक शासन किया। यह बात अलग है कि औरंगजेब के मरणोपरांत (1707 ई.) मुगल बादशाहों की वह धाक नहीं रही और वे नाममात्र के बादशाह रह गए। अंततः अंग्रेजों ने 1857 के महाविद्रोह के समय अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह II 'जफर' को अपदस्थ कर रंगून (वर्मा) निर्वासित कर मुगल वंश का शासन हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।
बाबर हुमायूँ कालीन झारखण्ड (1526-40 ई.)
मुगल बादशाहों बाबर (1526-30 ई.) एवं हुमायूँ (1530-40 ई.) के शासन काल में झारखण्ड उनके प्रभाव क्षेत्र के दायरे से बाहर था इसलिए झारखंड के क्षेत्रीय राजा बिना किसी बाह्य हस्तक्षेप के निर्बाध शासन करते रहे। चूँकि बाबर ने अफगानों को अपदस्थ कर मुगल वंश की स्थापना की थी इसलिए अफगान बिहार बंगाल में रहते हुए फिर से शक्ति जुटा कर मुगलों से टक्कर लेने की फिराक में थे। इस प्रकार, बाबर और हुमायूँ के शासन काल में झारखंड मुगल विरोधी अफगानों का आश्रय स्थल बन गया था। हुमायूँ मुगल-अफगान संघर्ष के दौरान एक मौके पर भुरकुंडा (हजारीबाग जिला) तक घुस आया था। हुमायूँ के सबसे बड़े शत्रु शेरशाह ने मुगल-अफगान संघर्ष (1530-40 ई.) में इस क्षेत्र का कई बार उपयोग किया था।
शेर खाँ (शेरशाह) और झारखण्ड
शेर खा 1528 ई. में दक्षिण बिहार का शासक बना। उसने मुगलों के विरुद्ध अपने संघर्ष (1530-40 ई.) में झारखंड क्षेत्र का कई बार उपयोग किया। इसके अलावा शेर खाँ ने बंगाल के शासक के साथ संघर्ष (1534-37 ई.) में बंगाल जाने और आने के क्रम में झारखंड से होकर गुजरा। शेर खाँ बंगाल जाते हुए झारखंड से पार हुआ था। जब वह स्वयं झारखंड पार कर रहा था, उसका पुत्र जलाल खौ तेलियागढ़ी (राजमहल के निकट, साहेबगंज जिला) की नाकाबंदी करने में लगा था। शेर खाँ बंगाल के शासक से लूटी गई सम्पदा के साथ राजमहल के पास गंगा पार किया और मुगलों को चकमा देता हुआ झारखंड के रास्ते रोहतासगढ़ पहुँचा। रोहतासगढ़ पर शेरखाँ ने 1538 ई. में अधिकार कर लिया।
झारखण्ड में मुसलमानों के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त करने वाला शेर खाँ ही था। 1538 ई. में शेर खाँ ने अपने सेनापति खवास खाँ को झारखण्ड के पलामू क्षेत्र के चेरी शासक महारब घेरो पर आक्रमण कर उसका दमन करने के लिए भेजा। महारथ चेरो अपने सहयोगियों के साथ लूट-पाट किया करता था। महारथ चेरो की लूट-पाट के कारण यात्रियों के लिए बंगाल आना जाना मुश्किल हो गया था। उसकी हिम्मत इतनी बढ़ गई थी कि वह शेर खाँ के शिविर से प्रायः हाथी, घोड़ा, ऊँट, बैल आदि लूट लिया करता था। शेर खाँ की अनुपस्थिति में वह झारखंड के जंगल पहाड़ों से निकल आता था और दक्षिण बिहार में घुस आता था और वहाँ के किसानों को तथा अन्य लेखकों के अनुसारइस आक्रमण का उद्देश्य था— श्याम सुंदर नामक एक सफेद हाथी को प्राप्त करना। श्याम सुंदर की कुछ विशेषताएँ थी, जैसे अपने मस्तक पर कभी धूल न डालना, मस्त हो जाने पर उसका को सामना करना कठिन होना आदि। शेर ख़ाँ के सेनापति खवास खाँ 4,000 घुड़सवारों के साथ तथा रोहतास से रवाना हुआ, सोन नदी पार किया और एक अत्यंत दुर्गम घाटी से गुजरा। अंतः खवास खाँ और दरिया खाँ ने महारथ चेरो को घेर लिया तथा उसे आत्मसमर्पण करने के मजबूर किया। लूट के अन्य सामानों के साथ श्याम सुन्दर हाथी को पाकर शेर खाँ अति प्रसन्न हुआ और उसने इसे मुगलों की गद्दी को हासिल करने का शुभ लक्षण माना।