Sunday, 29 August 2021

राजव्यवस्था

 भारतीय संविधान के प्रावधान के अनुसार झारखंड भारत संघ का एक अभिन्न अंग है। भारखंड भारत संघ का एक राज्य है। झारखंड की शासन प्रणाली भारत संघ के अन्य राज्यों । के समान है। झारखंड में संसदीय शासन प्रणाली स्थापित है।


राज्य सरकार के तीन प्रमुख अंग हैं


1 विधायिका (Legislature) : सरकार के कानून बनाने वाले अंग को 'विधायिका' कहते है। इसे 'व्यवस्थापिका' या विधान मंडल' भी कहा जाता है।


कार्यपालिका (Executive) : सरकार के कानूनों को कार्यान्वित करने वाले 'कार्यपालिका' कहते हैं।


अंग को


न्यायपालिका (Judiciary) सरकार के न्याय करने वाले अंग को 'न्यायपालिका' कहते हैं।


झारखंड की राजव्यवस्था: महत्वपूर्ण तथ्य


★ विधान मंडल का रूप


+ विधान सभा में कुल सदस्यों की संख्या विधान सभा में निर्वाचित सदस्यों की संख्या


विधान सभा में मनोनीत सदस्यों की संख्या


★ विधान सभा में स्थानों का आवंटन —


1: एकसदनात्मक (Unicameral) विधान सभा : 82 (81+1)


81


: 01 (एग्लो-इंडियन)


अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित 28 | अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित : 09/ आरक्षित 44 अनारक्षित


सामान्य वर्ग (GEN)


★ झारखंड से राज्य सभा के लिए चुने जाने वाले सदस्यों की संख्या


झारखंड से लोक सभा के लिए चुने जाने


वाले सदस्यों की संख्या लोक सभा में स्थानों का आवंटन


अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित :


सामान्य वर्ग (GEN)


* सबसे बड़ा संसदीय क्षेत्र


* सबसे छोटा संसदीय क्षेत्र


: 06


14


: 05 |


आरक्षित


01 : 08 अनारक्षित


: पश्चिमी सिंहभूम (सुरक्षित)


जिसका प्रमुख मुख्य मंत्री होता है जिसके नेतृत्व में मंत्रिपरिषद् वास्तविक अधिकार का प्रयोग संसदीय शासन प्रणाली के अंतर्गत राज्य में दो प्रकार की कार्यपालिका होती है नाममात्र की कार्यपालिका– जिसका प्रमुख राज्यपाल होता है, (b) वास्तविक कार्यपालिका— करती है। स्पष्ट है कि राज्य की कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल होता है जबकि वास्तविक प्रमुख मुख्य मंत्री व मंत्रिपरिषद् होता है।


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: चतरा

अकबर कालीन झारखंड (1556-1605 ई.)



अकबर कालीन झारखण्ड         (1556-1605 ई.)


मुगल बादशाह अकबर ने अपने शासन काल के पूर्वार्द्ध (1556-76 ई.) में झारखंड में सक्रिय मुगल विरोधी अफगानों का दमन किया। अपने शासन काल के उत्तरार्द्ध (1576-1605 ई.) में अकबर ने झारखंड के क्षेत्रीय राजवंशों- नाग वंश (छोटानागपुर खास), चेरो वंश (पलामू व सिंह वंश (सिंहभूम) को मुगलों का अधीनस्थ बनाया। वस्तुतः अकबर के शासन काल तीसवें वर्ष (अर्थात् 1585 ई.) में मुगल साम्राज्य एवं झारखंड के बीच वास्तविक सम्पर्क स्थापित हुआ। यह सम्पर्क 1585 ई. में उस समय स्थापित हुआ जब मुगल फौज ने छोटानागपुर खास के नागवंशी शासक मधुकरण शाह (मधु सिंह) पर आक्रमण किया, उसे हराया तथा उसे मुगल का अधीनस्थ बनाया।


1. अफगानों का दमन :अकबर विरोधी अफगानों में गाजी एवं हाजी बंधु, जुनैद एक बयाजिद प्रमुख थे। इन अफगानियों ने अकबर के विरुद्ध झारखंड क्षेत्र का उपयोग किया टकरोई की लड़ाई (3 मार्च, 1575 ई.) के बाद जुनैद करानी झारखंड के रास्ते बिहार भागने का प्रयास किया। भागने के क्रम में जुनैद ने रामपुर (आज का रामगढ़) नामक पहाड़ी क्षेत्र में शरण लिया। मुगल फौज पीछा करती हुई रामपुर पहुँची। रामपुर की लड़ाई में मुगल फौज ने जुनैद को पराजित किया। इस प्रकार, 1576 ई. तक झारखण्ड क्षेत्र में सक्रिय अकबर के सभी विरोधी अफगान या तो पराजित हो गए या उनकी मृत्यु हो गई।


2. छोटानागपुर खास का नाग वंश: अकबर के शासन काल में सर्वप्रथम मुगलों ने कोकरह खुखरा (नागवंश की तत्कालीन राजधानी) विजय की ओर ध्यान दिया। इसके सामरिक, राजनीतिक व आर्थिक कारण थे। सामरिक कारण- अकबर जानता था कि उसके पिता हुमायूँ के विरुद्ध शेर खाँ ने तथा स्वयं उसके विरुद्ध जुनैद आदि अफगानों ने इस क्षेत्र का बखूबी उपयोग किया था इसलिए इस क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित करना आवश्यक था। राजनीतिक कारण अकबर विस्तारवादी था और वह खुखरा को अपने साम्राज्य के दायरे में लाना चाहता था। आर्थिक कारण–अफगान जुनैद का पीछा करने तथा रामपुर की लड़ाई में उसे पराजित करने के बाद राजधानी लौटी मुगल सेना ने बादशाह अकबर को खुखरा की आर्थिक समृद्धि की जानकारी दी। यह भी कहा जाता है कि कोकरह की शंख नदी में मिलने वाले हीरों ने अकबर का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया। फिर दक्षिण भारत तक पहुँचने में यह नवीन मार्ग बड़े काम का साबित हो सकता था। दूसरी तरफ, अपनी दुनिया में मगन नागवंशी राजा मुगलों की बढ़ती शक्ति की उपेक्षा करते रहे। अबुल फजल के अनुसार खुखरा तक पहुँचने के दुर्गम मार्ग के कारण नागवशी राजा अपने को अति सुरक्षित महसूस करते थे।शाही आदेशानुसार 1585 ई. में शाहबाज खाँ कम्बू ने खुखरा विजय के लिए एक सेना को भेजा। मुगल फौज तेजी से खुखरा की ओर बढ़ी। इलाके में घुसकर मुगल फौज मार काट तथा लूट-पाट मचाने लगी। घबराकर खुखरा के राजा मधुकरण शाह ने मुगल अधीनता स्वीकार कर लिया और सालाना कर देना मंजूर किया। अबुल फजल के शब्दों में खुखरा के राजा ने मालगुजार की स्थिति को स्वीकार कर लिया और इस तरह बादशाही हुकूमत के साये में आने का उसे सौभाग्य प्राप्त हुआ। नागवंशी राजा मधुकरण शाह को बंदी बनाकर मुगल दरबार में ले जाया गया जहाँ उसकी शारीरिक क्षमता एवं विनीत स्वभाव से प्रसन्न होकर बादशाह अकबर ने उसे स्वतंत्र कर खुखरा वापस भेज दिया। खुखरा नरेश मधुकरण शाह ने उड़ीसा के शासक कुतुल खाँ व उसके बेटे निसार खाँ के विरुद्ध मुगल मनसबदार मान सिंह के नेतृत्व में 1590-92 ई. में हुए मुगल अभियान में मुगलों का साथ दिया।


इस तरह, 16वीं सदी ई. के अंत तक खुखरा का एकाकीपन समाप्त हो गया। यह क्षेत्र मुगलों के नियंत्रण में आ गया और उन्हें सालाना कर भी देने लगा। साथ ही, नागवंशी राजा मुगलों का अधीनस्थ सहयोगी बन गया जैसा कि उड़ीसा अभियान के दौरान उसके द्वारा मुगलों को दी गई सहायता से स्पष्ट है।


3 मानभूम (धनबाद) व हजारीबाग क्षेत्र के राजवंश :मानभूम एवं हजारीबाग वाले क्षेत्र भी सर्वप्रथम अकबर के समय में मुगलों के सम्पर्क में आये। 1590-91 ई. में राजा मान सिंह मिदनापुर जाते हुए मानभूम से गुजरा। उसने परा तथा तेलकुप्पी के मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया। से पचेत का किला भी इसी समय निर्मित हुआ। अबुल फजल की आईन-ए-अकबरी के अनुसार हजारीबाग का है तथा चम्पा नामक दो स्थान परगनों के रूप में बिहार सूबा (बिहार प्रांत) में शामिल थे तथा इसकी सालाना मालगुजारी 15,500 रुपये तय की गई थी।


4. पलामू का चेरो वंश: 1589 ई. में राजा मान सिंह बिहार के मुगल सूबेदार बने। पटना को अपने पुत्र जगत सिंह की देख-रेख में छोड़कर मान सिंह पलामू के लिए कूच किया। चेरो ने घरों में उसे रोकने का विफल प्रयास किया। मान सिंह अपनी सेना के साथ आगे बढ़ता ही गया। उसने अनेक चेरो को मार डाला तथा कई चेरो को बंदी बना लिया। पलामू में अपनी स्थिति मजबूत बनाने के बाद वह पटना लौट गया। मान सिंह ने लूट का माल, जिसमें 54 हाथी भी शामिल थे, मुगल दरबार में भेजा। यह माल बादशाह अकबर के पास 3 अप्रैल, 1590 ई. को पहुँचा। भागवत राय (रणपत चोरूह) को पलामू का राजा बना रहने दिया गया और वहाँ एक मुगल फौज रख दी गई। इस तरह चेरो की शक्ति पूर्णरूपेण समाप्त नहीं हुई बल्कि वे कुछ समय के लिए दब गए। वर्ष 1605 ई. में मुगल बादशाह अकबर की मृत्यु से फैली गड़बड़ी का चेरों ने भरपूर फायदा उठाया। उन्होंने मुगल फौज को मार भगाया और अपनी स्वतंत्र सत्ता पुनर्स्थापित कर ली।


5. सिंहभूम का सिंह वंश :खुखरा, मानभूम व हजारीबाग तथा पलामू की भाँति सिंहभूम से भी मुगलों का सम्पर्क अकबर के समय में स्थापित हुआ। वर्ष 1592 के उड़ीसा अभियान के समय राजा मान सिंह सिंहभूम होकर गुजरा। पोरहाट के तत्कालीन सिंहवंशी राजा रणजीत सिंह ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली और वह राजा मान सिंह के अंगरक्षक दल में शामिल हो गया।


1592 ई. में राजा मान सिंह ने राजमहल (साहेबगंज जिला) को बंगाल की राजधानी बनाया। परकोटा और महल वाले नगर का नाम 'अकबर नगर रखा गया। नगर की तीव्र गति

मुगलकालीन झारखंड (1526-1707 ई.)



          मुगलकालीन झारखंड               (1526-1707 ई.)


बाबर ने दिल्ली सल्तनत के अंतिम सुल्तान इब्राहिम लोदी को पानीपत के प्रथम युद्ध (1526 ई.) में हराकर मुगल वंश की स्थापना की। 1540 ई. से 1555 ई. तक यह शासन सूर वंश (शेरशाह व उनके वंशज) के हाथों में चला गया। हुमायूँ ने 1556 ई. में मुगल वंश को पुनर्स्थापित किया। इसके बाद मुगलवंशियों ने 1857 ई. तक शासन किया। यह बात अलग है कि औरंगजेब के मरणोपरांत (1707 ई.) मुगल बादशाहों की वह धाक नहीं रही और वे नाममात्र के बादशाह रह गए। अंततः अंग्रेजों ने 1857 के महाविद्रोह के समय अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह II 'जफर' को अपदस्थ कर रंगून (वर्मा) निर्वासित कर मुगल वंश का शासन हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।


बाबर हुमायूँ कालीन झारखण्ड (1526-40 ई.)


मुगल बादशाहों बाबर (1526-30 ई.) एवं हुमायूँ (1530-40 ई.) के शासन काल में झारखण्ड उनके प्रभाव क्षेत्र के दायरे से बाहर था इसलिए झारखंड के क्षेत्रीय राजा बिना किसी बाह्य हस्तक्षेप के निर्बाध शासन करते रहे। चूँकि बाबर ने अफगानों को अपदस्थ कर मुगल वंश की स्थापना की थी इसलिए अफगान बिहार बंगाल में रहते हुए फिर से शक्ति जुटा कर मुगलों से टक्कर लेने की फिराक में थे। इस प्रकार, बाबर और हुमायूँ के शासन काल में झारखंड मुगल विरोधी अफगानों का आश्रय स्थल बन गया था। हुमायूँ मुगल-अफगान संघर्ष के दौरान एक मौके पर भुरकुंडा (हजारीबाग जिला) तक घुस आया था। हुमायूँ के सबसे बड़े शत्रु शेरशाह ने मुगल-अफगान संघर्ष (1530-40 ई.) में इस क्षेत्र का कई बार उपयोग किया था।


शेर खाँ (शेरशाह) और झारखण्ड


शेर खा 1528 ई. में दक्षिण बिहार का शासक बना। उसने मुगलों के विरुद्ध अपने संघर्ष (1530-40 ई.) में झारखंड क्षेत्र का कई बार उपयोग किया। इसके अलावा शेर खाँ ने बंगाल के शासक के साथ संघर्ष (1534-37 ई.) में बंगाल जाने और आने के क्रम में झारखंड से होकर गुजरा। शेर खाँ बंगाल जाते हुए झारखंड से पार हुआ था। जब वह स्वयं झारखंड पार कर रहा था, उसका पुत्र जलाल खौ तेलियागढ़ी (राजमहल के निकट, साहेबगंज जिला) की नाकाबंदी करने में लगा था। शेर खाँ बंगाल के शासक से लूटी गई सम्पदा के साथ राजमहल के पास गंगा पार किया और मुगलों को चकमा देता हुआ झारखंड के रास्ते रोहतासगढ़ पहुँचा। रोहतासगढ़ पर शेरखाँ ने 1538 ई. में अधिकार कर लिया।


झारखण्ड में मुसलमानों के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त करने वाला शेर खाँ ही था। 1538 ई. में शेर खाँ ने अपने सेनापति खवास खाँ को झारखण्ड के पलामू क्षेत्र के चेरी शासक महारब घेरो पर आक्रमण कर उसका दमन करने के लिए भेजा। महारथ चेरो अपने सहयोगियों के साथ लूट-पाट किया करता था। महारथ चेरो की लूट-पाट के कारण यात्रियों के लिए बंगाल आना जाना मुश्किल हो गया था। उसकी हिम्मत इतनी बढ़ गई थी कि वह शेर खाँ के शिविर से प्रायः हाथी, घोड़ा, ऊँट, बैल आदि लूट लिया करता था। शेर खाँ की अनुपस्थिति में वह झारखंड के जंगल पहाड़ों से निकल आता था और दक्षिण बिहार में घुस आता था और वहाँ के किसानों को तथा अन्य लेखकों के अनुसारइस आक्रमण का उद्देश्य था— श्याम सुंदर नामक एक सफेद हाथी को प्राप्त करना। श्याम सुंदर की कुछ विशेषताएँ थी, जैसे अपने मस्तक पर कभी धूल न डालना, मस्त हो जाने पर उसका को सामना करना कठिन होना आदि। शेर ख़ाँ के सेनापति खवास खाँ 4,000 घुड़सवारों के साथ तथा रोहतास से रवाना हुआ, सोन नदी पार किया और एक अत्यंत दुर्गम घाटी से गुजरा। अंतः खवास खाँ और दरिया खाँ ने महारथ चेरो को घेर लिया तथा उसे आत्मसमर्पण करने के मजबूर किया। लूट के अन्य सामानों के साथ श्याम सुन्दर हाथी को पाकर शेर खाँ अति प्रसन्न हुआ और उसने इसे मुगलों की गद्दी को हासिल करने का शुभ लक्षण माना।

भूगर्भिक संरचना (Geography)

 झारखण्ड राज्य की भूगर्भिक संरचना (Geological structure) में प्राचीनतम आर्कियन कालीन चट्टानों से लेकर नवीनतम चतुर्थकल्पकालीन जलोढ़ निक्षेपण तक पाये जाते हैं। झारखण्ड की भूगर्भिक संरचना का कालक्रमानुसार विवरण इस प्रकार है


1. ऑर्कियन ग्रेनाइट नीस एवं धारवाड़ की चट्टानें इन्हें पैतृक चट्टान कहा जाता है, जो झारखण्ड के लगभग 90% क्षेत्र में मौजूद है। ग्रेनाइट चट्टानें कहीं कहीं नीस में बदल गई हैं। आर्कियन काल से ही इस तरह की चट्टानें यहाँ हैं। ये परतवाली चट्टानें पूर्वी व पश्चिमी सिंहभूम सरायकेला, सिमडेगा एवं झारखण्ड के दक्षिण-पूर्वी भाग में हैं। ये चट्टानें आर्थिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि इनमें प्रचुर मात्रा में खनिज मिलते हैं।


2. विध्यन श्रेणी चट्टानें इनमें बलुआ पत्थर व चूना पत्थर पाया जाता है। इनमें भी परतें होती हैं। ऐसी चट्टानें गढ़वा जिले के उत्तरी भाग में हैं। 3. गोंडवाना श्रेणी की चट्टानें: दामोदार घाटी के तलछट से बनी इन चट्टानों में बलुआ


पत्थर व कोयले की परतें होती हैं। जब भूखण्डों का विचलन होता है उनके बीच की भूमि


धंस जाती हैं और घाटी का निर्माण होता है। उत्तरी कोयल की घाटी, गिरिडीह एवं राजमहल


की पहाड़ियों में ऐसी चट्टानें मिलती हैं। झाखण्ड के प्रमुख कोयला निक्षेपों का निर्माण इसी श्रेणी


के चट्टानों से हुआ है।


4. राजमहल ट्रैप एवं दक्कन लावा की चट्टानें लावा के बहने से राजमहल ट्रैप बना तथा रुक-रुक कर दरारों से जो प्रवाह चला उससे दक्कन लावा बना। ये ही अपक्षयित होकर लेटेराइट एवं बाक्साइट बन गए। पाट प्रदेश, साहेबगंज का उत्तर-पूर्वी भाग तथा पाकुड का पूर्वी भाग इसी जमाव का परिणाम है। पलामू, गढ़वा, लोहरदगा व गुमला को 'पाट प्रदेश' कहते हैं। इसकी ऊँचाई 900 मीटर है।


5. नवीनतम जलोढ़ निक्षेप नदी घाटी क्षेत्रों में जलोढ़ निक्षेप से निर्मित संरचना पाई जाती है। इस तरह की संरचना झारखण्ड के सीमित क्षेत्रों जैसे कि राजमहल के पूर्वी भाग, सोन घाटी, स्वर्णरेखा की निचली घाटी आदि में पाये जाते हैं।

Monday, 23 August 2021

JHARKHAND (GEOGRAPHY )

 1. परिचय


भारत के उत्तर-पूर्वी भाग में स्थित झारखण्ड जहाँ क्षेत्रफल की दृष्टि से देश में 15वें स्थाप

पर है, वहीं जनसंख्या की दृष्टि से 13वें स्थान पर है। राज्य की भूगर्भिक संरचना में

प्राचीनतम आर्कियनकालीन चट्टान पाये जाते हैं, वहीं नवीनतम चतुर्थकल्पकालीन जलोढ़ निशेषण

भी। इस राज्य के धरातलीय स्वरूप के निर्माण में छोटानागपुर पठार की सर्वप्रमुख भूमिका है,

जो प्रायद्वीपीय पठारी भाग का उत्तर-पूर्वी खण्ड है। झारखण्ड की नदियां बरसाती नदियां है।

झारखण्ड के पठारी क्षेत्र में अनेक जलप्रपात हैं। राज्य में अनेक गर्म जलकुंड हैं जिनके

रोगनाशक शक्ति पायी जाती है। झारखण्ड की जलवायु उष्णकटिबंधीय मानसूनी प्रकार की है।

झारखण्ड में पायी जाने वाली मिट्टी अवशिष्ट मिट्टी है। राज्य के कुल क्षेत्रफल के 29.61% भाग

में वन पाये जाते हैं।


पठारी क्षेत्र होने के कारण झारखण्ड में कृषि योग्य भूमि बहुत ही कम है। सिंचाई साधनों

के विस्तार के लिए सिंचाई परियोजनाएं चलाई जा रही हैं। बहुउद्देश्यीय नदी घाटी परियोजनाओं

में दामोदर घाटी परियोजना एवं स्वर्णरेखा नदी परियोजना महत्त्वपूर्ण हैं। राज्य में अनेक ताप

विद्युत् एवं जल विद्युत् परियोजनाएं चलाई जा रही हैं। खनिज संसाधन की दृष्टि से झारखण्ड

भारत का सबसे धनी प्रदेश है। झारखण्ड को 'भारत का रूर प्रदेश' कहा जाता है। वस्तुतः यहाँ

की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार खनिज व उन पर आधारित उद्योग ही हैं। यहाँ चार प्रमुख

औद्योगिक केन्द्र हैं जमशेदपुर, राँची, बोकारो व धनबाद झारखण्ड में सड़क, रेल व वायु

परिवहन उपलब्ध हैं। जनगणना 2011 के अनुसार झारखण्ड की कुल जनसंख्या 3, 29, 88, 134,

जनसंख्या घनत्व 414 प्रति वर्ग किमी., दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर 22.42%, लिंगानुपात 947

एवं साक्षरता दर 66.41% है। झारखण्ड एक ग्रामीण क्षेत्र बहुल राज्य है। यह एक हिन्दू बहुल

राज्य है।


राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग एक चौथाई भाग (26.2%) अनुसूचित जनजातियों का

है। अभी तक झारखण्ड की 32 जनजातियों को अनुसूचित जनजाति घोषित किया जा चुका

झारखण्ड में धर्मों की बहुरंगी छटा मिलती है। झारखण्ड की सर्वप्रमुख भाषा हिन्दी है। इसके

अलावा संथाली, बांग्ला, उर्दू आदि झारखण्ड में अधिक बोली जानेवाली भाषाएँ हैं।

झारखण्ड भूगोल

1.झारखंड भारत के .....भाग में स्थित है।
(a) उतरी पूर्वी (b) उत्तरी पश्चिमी (c) उत्तरी (d)दक्षिणी
Ans-A
2.क्षेत्रफल की दृष्टि से झारखंड का देश मे स्थान है।
(a)10वॉ (b)14वॉ (c)15वॉ (d)16वॉ
Ans-C
3. जनसंख्या की दृष्टि से झारखंड का देश मे स्थान है।
(a)10वॉ(b)11वॉ (c)12वॉ (d)13वॉ
Ans-D
4. खनिज संसाधन की दृष्टि से. भारत का सबसे धनी राज्य कौन.सा है?
(a)बिहार.(b) झारखंड (c) मध्यप्रदेश (d) राजस्थान
Ans-B
5. निम्नलिखित मैं से किसे भारत का रुर प्रदेश , कहा जाता है
(a) झारखंड (b) बिहार (c)  पश्चिम बंगाल (d) उड़ीसा
Ans-A

Sunday, 22 August 2021

अंग्रेजो का झारखण्ड प्रवेश

1. झारखण्ड में अंग्रेजो का प्रवेश किस ओर से हुआ।
(a) सिंहभूम (b) पलामू (c) संथाल परगना (d) इनमे से कोई नहीं
Ans-A
2. सिंहभूम में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रवेश किस वर्ष आरम्भ हुआ।
(a) 1767ई.(b) 1837ई.(c) 1822ई.(d) 1823ई.
Ans-A
3. कंपनी काल में झारखण्ड की कोन सी जनजाति ’लड़का कोल’ के नाम से प्रसिद्ध थी?
(a) हो (b) संथाल (c) मुंडा (d) खैरवार
Ans-A
4. अंग्रेज सेनापति कैप्टेन जेकब कैमक ने पलामू किले पर वर्ष अधिकार किया।
(a) 1767ई. (b) 1771ई.(c) 1867ई.(d) 1871ई.
Ans-B
5. अंग्रेजो ने रामगढ़ राज्य पर किस वर्ष अपना कब्जा जमाया।
(a)1771 ई.( b ) 1772ई.  (c ) 187ई.(d) 1872 ई.
Ans- B
6. कोल्हल गवरमेंट ईस्ट का गठन किया गया ।
(a) 1737 ई.(b)1837 ई.(c) 1937ई. (d) इनमे से कोई नहीं
Ans-B